Month: June 2022

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17वीं अखिल भारतीय जन विज्ञान कांग्रेस के दौरान चारों दिन के विभिन्न सत्रों, स्टॉल, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और इस आयोजन के उद्देश्य एवं पृष्ठभूमि को लेकर एक न्यूज बुलेटिन प्रकाशित किया गया। इस न्यूज बुलेटिन के प्रकाशन में राजु नीरा, फरहा खान, ईशान, सीमा कुरुप और सचिन का सहयोग रहा।

विज्ञान, विचार और कला के उद्घोष के बीच 17th AIPSC का समापनविज्ञान, विचार और कला के उद्घोष के बीच 17th AIPSC का समापन

17th AIPSC: देश में वैज्ञानिक चेतना को मजबूत करने के लिए करेंगे जमीनी कार्रवाई

नई कार्यकारिणी: आयसर पुणे के वैज्ञानिक प्रो. सत्यजीत रथ अध्यक्ष और मध्यप्रदेश बीजीवीएस की आशा मिश्रा चुनी गईं महासचिव
मध्य प्रदेश विज्ञान सभा के एस.आर. आजाद बने आल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क के कोषाध्यक्ष
4 दिन में 12 सत्र और 28 कार्यशालाओं में 70 से अधिक विशेषज्ञों ने रखी अपनी बात

एक्सटॉल कॉलेज में 6 से 9 जून के बीच संविधान, समाज, विज्ञान, कृषि, कोविड, महिला, बच्चों, जेंडर, पर्यावरण, किसान, सोशल मीडिया, विकास, आदिवासी, अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक चेतना समेत विविध विषयों पर 70 से अधिक विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी। इस दौरान देश के 20 से अधिक राज्यों के आए 800 से अधिक प्रतिनिधियों ने इस बातचीत में हस्तक्षेप किया। साथ ही अपने अपने राज्यों, क्षेत्रों और समुदायों की सांस्कृतिक विविधता से रूबरू कराते हुए संवाद किया। यह मौका था 17वीं अखिल भारतीय ​जन विज्ञान कांग्रेस का (17th AIPSC), जिसे आल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (AIPSN) की ओर से आयोजित किया गया।

‘आइडिया आफ इंडिया,’ यानी “भारत का विचार” थीम पर आयोजित इस आयोजन (17th AIPSC) के उद्घाटन सत्र को वरिष्ठ पत्रकार और जनसरोकार की पत्रकारिता के प्रमुख स्तंभ पी. साईनाथ ने संबोधित किया, तो समापन समारोह के मुख्य वक्ता नाल्सर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के कुलपति एवं संविधान विशेषज्ञ प्रो. फैजान मुस्तफा थे। 

कार्यक्रम (17th AIPSC) के उद्घाटन समारोह में स्वागत उद्बोधन वरिष्ठ साहित्यकार रामप्रकाश त्रिपाठी ने दिया। सत्रों के संचालन की जिम्मेदारी विज्ञान सभा के एस आर आजाद, बीजीवीएस के राहुल शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता सत्यम पांडे आदि ने निभाई।

समापन समारोह (17th AIPSC) के बाद अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क की नई कार्यकारिणी की घोषणा की गई। इसमें अध्यक्ष आयसर पुणे के वैज्ञानिक प्रो. सत्यजीत रथ को नियुक्त किया गया। वहीं मध्यप्रदेश भारत ज्ञान विज्ञान समिति की आशा मिश्रा को महासचिव और मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के एस.आर. आजाद को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। अंत में यह संकल्प लिया गया कि आने वाले दिनों में देश में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार को लेकर कार्यक्रम बनाए जाएंगे।

समापन सत्र में प्रो. फैज़ान मुस्तफा ने कहा कि कानून का मतलब न्याय होता है, लेकिन कानून के केन्द्र में शक्ति हो गई है। आज स्थिति यह है कि लोगों के न्याय क्या है, बताना मुश्किल हो गया है। पर हमें अन्याय भी नहीं दिख रहा है। किसी के साथ हो रहे अन्याय को देखकर हम विचलित क्यों नहीं हो रहे हैं? यदि ऐसा नहीं हो रहा है, तो मनुष्यता पर प्रश्नचिह्न लगता है। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी दी हुई है। इसका साफ मतलब है कि व्यक्ति के दिल में जो कुछ भी है, उसे बोलने दिया जाए। जो समाज बोलने से रोकता है, वह आगे नहीं बढ़ सकता। जनता की सहमति से सरकार है, तो जनता की भागीदारी सरकार की नीतियों पर बोलकर ही हो सकती है। यह प्रशंसा के रूप में भी हो सकता है या फिर आलोचना के रूप में। उन्होंने कहा कि देश में वैज्ञानिक चेतना के बिना देश को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। देश में नफरती भाषणों के खिलाफ कड़े कानून बनाने की जरूरत है। आज देश में धर्म, सत्ता और कार्पोरेट का गठजोड़ है, यदि हम इसे समझ जाएंगे, तो संभव है कि कुछ बेहतर कर पाएं।

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा आज जो देशमें धर्मान्धता फैली है, उसे वैज्ञानिक चेतना से खत्म किया जा सकता है। वैज्ञानिक चेतना के लिए जन विज्ञान आंदोलन से जुड़े लोगों को सामूहिक रूप से आगे आकर काम करना होगा।

शिक्षाविद प्रो. आर. रामानुजम ने कहा कि आज जनता डेटा बन गई है। हमें तकनीक के सही इस्तेमाल के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सोनाझारिया मिंज ने कहा कि समाज के उन आयामों की पहचान की जाए, जहां वैज्ञानिक चेतना में कमी है और फिर हमें उन क्षेत्रों में काम करने की जरूरत है।

संसाधनों के बावजूद पिछड़ा हुआ है मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के विकास पर बात करते हुए डॉ. योगेश कुमार, सचिन जैन, राजेन्द्र कोठारी, संदीप दीक्षित सहित कई वक्ताओं ने कहा कि मध्यप्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है, लेकिन इसके बावजदू स्वास्थ्य, शिक्षा एवं रोजगार में प्रदेश पिछड़ा हुआ है।

विकास संवाद के निदेशक सचिन जैन ने कहा कि सामाजिक विकास के संकेतकों में मध्यप्रदेश पिछड़ा हुआ है। एक ओर केरल में जहां शिशु मृत्यु दर 6 है, वहीं मध्यप्रदेश में इसकी संख्या 43 है। स्वास्थ्य की स्थिति देखा जाए, तो प्रदेष में 14 हजार से ज्यादा उप स्वास्थ्य केन्द्र चाहिए, लेकिन पिछले 15 सालों से 4 हजार की कमी बनी हुई है। एनएफएचएस के नए आंकड़ों में देखा जाए तो गांवों में स्वच्छ ईंधन का उपयोग मात्र 23 फीसदी घरों में है।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राजेन्द्र कोठारी ने कहा कि मध्यप्रदेश की प्रति व्यक्ति आय देश की तुलना में दो तिहाई ही है। प्राकृतिक संसाधन के बावजूद कुपोषण, बेरोजगारी और अन्य समस्याएं हैं।

मध्यप्रदेश के मानव विकास पर काम करने वाले वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता संदीप दीक्षित ने कहा कि प्रदेश के 95 फीसदी नेतृत्व यहां की संभावनाओं को छूते ही नहीं है। असीम संभावनाओं के बावजूद हम आगे नहीं बढ़ पाए। राजनीतिक नेतृत्व प्रदेश के बजाय व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए संसाधनों का दोहन कर रहा है।

किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बादल सरोज ने कहा कि मध्यप्रदेश के संसाधनों को बचाने में यहां के जन आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही है, यदि ऐसा नहीं होता, तो विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन को सरकार बेच देती। यह लड़ाई अभी भी जारी है।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव शरदचन्द्र बेहार ने कहा कि प्रदेश में पंचायत राज को मजबूत करने के बजाय खत्म करने का प्रयास किया जाता रहा है, ऐसे में विकेंद्रीकृत विकास की संभावनाएं खत्म होती है।

समर्थन संस्था के निदेशक डॉ. योगेश कुमार ने कहा कि पंचायतों की ताकत कम करने से शक्तियां केंद्रीकृत हो जाती है, जिसकी वजह ग्राम सरकार की अवधारणा खत्म हो जाती है। यह जरूरी है कि पंचायतों एवं राज्य स्तर के संस्थानों में शक्ति का सही तरीके से बंटवारा किया जाए और हमें पंचायत राज को मजबूत करने का प्रयास करना होगा।

अंतिम दिन समापन सत्र में संविधान और वैज्ञानिक चेतना के साथ मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के विकास पर चर्चा की गई। आखिरी सत्र में अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क की नई समिति भी गठित की गई। इस अवसर पर विज्ञान एवं संविधान से जुड़ी विभिन्न पुस्तकों का विमोचन किया गया। साथ ही पूरे आयोजन की विस्तृत रिपोर्ट के रूप में 8 पृष्ठों के अखबार का विमोचन किया गया।

शाम को विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।

कार्यक्रम स्थल पर विभिन्न राज्यों के पुस्तकें एवं उत्पादों के स्टॉल लगाए गए । आंध्रप्रदेश के प्रतिभागियों ने अंधविश्वास एवं भ्रांतियों की वैज्ञानिक व्याख्या के लिए लाइव डेमो का स्टॉल लगाया । “भारत का विचार’’ को लेकर विभिन्न महापुरुषों एवं वैज्ञानिकों के वक्तव्य के साथ वरिष्ठ चित्रकार मनोज कुलकर्णी की पेंटिंग प्रदर्शनी लगाई गई।

आजादी के 75वें साल में कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हो लड़ाई : पी. साईनाथआजादी के 75वें साल में कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हो लड़ाई : पी. साईनाथ

भोपाल में आयोजित 4 दिवसीय 17वीं अखिल भारतीय जन विज्ञान कांग्रेस में देश भर के 800 से ज्यादा वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता कर रहे हैं हिस्सेदारी

राजु कुमार
भोपाल में आयोजित 4 दिवसीय 17वीं अखिल भारतीय जन विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन अनूठे अंदाज में करते हुए मंच से भारत के संविधान की प्रस्तावना के उद्घोष और प्रतिभागियों द्वारा झंडे को लहराते हुए किया गया। ये रंगीन झंडे भारत की विविधता और बहुलता को दर्शा रहे थे। इसके पहले लिटिल इप्टा द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुति भी दी गई। उद्घाटन में देश भर के वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा स्थानीय लोगों ने भी भागीदारी की।

जन विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने कहा कि पिछले 10 सालों में असमानता की खाई ज्यादा गहरी हुई है। आजादी के 75वें साल में कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हमें लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि आजादी के अमृत महोत्सव में आजादी के मूल्यों और संवैधानिक मूल्यों की बात नहीं की जा रही है। आजादी के 75वें साल में 75 साल की उपलब्धि को नहीं, बल्कि 7-8 साल की उपलब्धि दिखाई जा रही है। देश की स्थिति गंभीर है, ऐसे में तार्किकता को कैसे बढ़ाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है। हमने देखा है कि कैसे पिछले दो सालों में कोविड के समय में कार्पोरेट की आमदनी में बढ़ोतरी हुई है और आम आदमी की आर्थिक स्थिति खराब हुई है। कार्पोरेट मीडिया के माध्यम से 75 फीसदी जनता की आवाज को सामने नहीं लाया जा सकता। तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया महज 25 फीसदी तक सिमटे हुए हैं। ये कार्पोरेट मीडिया बड़े विज्ञापनदाता भी हैं। ऐसे में देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिए बिना समानता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों की समस्याओं का हल नहीं किया जा सकता।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि केरला की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा ने कहा कि समानता, सबको अवसर, आजीविका के बिना देश में सही मायने में लोकतंत्र नहीं है। आज पूंजीवादी एवं सामंतवादी व्यवस्था हावी है। वास्तविक आजादी के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। देश में 2 हजार से ज्यादा भाषाएं हैं, 6000 से ज्यादा जातियां हैं, सैकड़ों पंथ एवं कई धर्म हैं। इस विविधता का हमें सम्मान करना होगा। संविधान बनाते समय हमने प्रगतिशील विचारों को अपनाया और अखंडता, समता, समानता एवं समाजवाद की बात की। इन्हें आज हम बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हासिल नहीं कर सकते। सामाजिक बदलाव के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण बहुत ही जरूरी है। उन्होंने अपने उद्बोधन में कोविड-19 के समय केरल सरकार द्वारा किए गए प्रबंधन के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि केरल में बेड या ऑक्सीजन के अभाव में किसी व्यक्ति की मौत नहीं हुई। केरल ने कोविड-19 महामारी का सामना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ किया।

इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिक्स साइंसेस, चेन्नई की प्रो. डी. इंदुमती ने कहा कि उच्च शिक्षा में दशमलव 6 फीसदी बजट खर्च हो रहा है, जिसकी वजह से विज्ञान में शोध के अवसर कम हुए हैं। उन्होंने इस बात पर चिंता जाहिर की कि शोध संस्थानों में भी जिस तरह से लिखित परीक्षा के माध्यम से केन्द्रीकृत तरीके नामांकन दिया जा रहा है, उससे बहुत सारी प्रतिभाओं को मौका नहीं मिल पा रहा है। हम तकनीक को अपनाते जा रहे हैं, लेकिन मूल विज्ञान पर न तो शोध कर रहे हैं और न ही उसकी चर्चा। आज इस बात की जरूरत है कि नए शोध संस्थान खोले जाएं और उनके लिए ज्यादा फंड दिए जाएं।

वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने अपनी एक कविता ‘‘यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’’ सुनाते हुए वर्तमान राजनीतिक और वैज्ञानिक चुनौतियों पर टिप्पणी की। उन्होंने सुनाया – ….. व्यक्ति के लिए नहीं, पूरे देश के लिए हानिकारक है/दिनोंदिन बढ़ते जाना अमेरिका का दबाव, राष्ट्रवाद का नया उफान/वित्त पूंजी का प्रपंच, बजरंगियों का उत्पात, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का/लगातार फैलता जाल/एक प्रधानमंत्री का इतनी बुरी कविता लिखना/हानिकारक है………./हानिकारक है संविधान की समीक्षा, इतिहास परिषद पर मंडराता खतरा/और सबसे हानिकारक है उनका राष्ट्रवाद…….।

कार्यक्रम की प्रस्तावना पर बोलते हुए ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क के अध्यक्ष डॉ. सब्यसाची चटर्जी ने कहा कि मेघनाथ साहा, रबिन्द्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे हमारे देश के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक, साहित्यकारों एवं राजनेताओं ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात की है, जिन्होंने भारत की विविधता और बहुलता में एकता को महत्व दिया है। आज इसे नकारने का प्रयास किया जा रहा है।

स्वागत उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार रामप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि आज हम अवैज्ञानिक एवं चुनौतीपूर्ण समय में जी रहे हैं। विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिक बातें की जा रही हैं, जबकि भारतीय संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है। मौजूदा समय में जन विज्ञान आंदोलन की ज्यादा जरूरत है। उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुए राहुल शर्मा ने कहा कि आज के समय में विज्ञान एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना सामाजिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।

कार्यक्रम में पुस्तकों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर बिहार एवं मध्यप्रदेश के साथ-साथ उत्तर-पूर्व के राज्यों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी। विभिन्न राज्यों के पुस्तकें एवं उत्पादों के स्टॉल लगाए गए हैं। आंध्रप्रदेश के प्रतिभागियों ने अंधविश्वास एवं भ्रांतियों की वैज्ञानिक व्याख्या के लिए लाइव डेमो का स्टॉल लगाया है। जन विज्ञान कांग्रेस में अगले दो दिनों तक शिक्षा एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति, आजादी के 75वें साल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर विचार, स्वास्थ्य, निजीकरण एवं विकास सहित पैनल विमर्श के साथ-साथ उप विषयों पर दर्जनों कार्यशालाएं आयोजित होंगी।

आयोजन में प्रो. अनिता रामपाल, प्रो. सुरोजीत मजूमदार, पूर्वा भारद्वाज, प्रो. आर. रामानुजन, प्रो. विनीता गोवडा, प्रो. डी. इंदुमती, मयंक वाहिया, गौहर रजा, किशोर चंद्र, विवेक मोंटेरियो, प्रो. सत्यजीत रथ, समीर गर्ग, इंदिरा चक्रवर्ती, वंदना प्रसाद, टी. सुंदररमन, दिनेष अब्रोल, अशोक धावले, डी. रघुनंदन, रामालिंगम ई., थॉमस फ्रैंको सहित कई वरिष्ठ वैज्ञानिक, शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इस दौरान “भारत का विचार : वैज्ञानिक स्वभाव, आत्मनिर्भरता और विकास“ विषय पर वरिष्ठ चित्रकार मनोज कुलकर्णी की पेंटिंग प्रदर्शनी लगाई गई है। जन विज्ञान कांग्रेस का समापन 9 जून को किया जाएगा।