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आजादी के 75वें साल में कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हो लड़ाई : पी. साईनाथआजादी के 75वें साल में कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हो लड़ाई : पी. साईनाथ

भोपाल में आयोजित 4 दिवसीय 17वीं अखिल भारतीय जन विज्ञान कांग्रेस में देश भर के 800 से ज्यादा वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता कर रहे हैं हिस्सेदारी

राजु कुमार
भोपाल में आयोजित 4 दिवसीय 17वीं अखिल भारतीय जन विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन अनूठे अंदाज में करते हुए मंच से भारत के संविधान की प्रस्तावना के उद्घोष और प्रतिभागियों द्वारा झंडे को लहराते हुए किया गया। ये रंगीन झंडे भारत की विविधता और बहुलता को दर्शा रहे थे। इसके पहले लिटिल इप्टा द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुति भी दी गई। उद्घाटन में देश भर के वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा स्थानीय लोगों ने भी भागीदारी की।

जन विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने कहा कि पिछले 10 सालों में असमानता की खाई ज्यादा गहरी हुई है। आजादी के 75वें साल में कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हमें लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि आजादी के अमृत महोत्सव में आजादी के मूल्यों और संवैधानिक मूल्यों की बात नहीं की जा रही है। आजादी के 75वें साल में 75 साल की उपलब्धि को नहीं, बल्कि 7-8 साल की उपलब्धि दिखाई जा रही है। देश की स्थिति गंभीर है, ऐसे में तार्किकता को कैसे बढ़ाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है। हमने देखा है कि कैसे पिछले दो सालों में कोविड के समय में कार्पोरेट की आमदनी में बढ़ोतरी हुई है और आम आदमी की आर्थिक स्थिति खराब हुई है। कार्पोरेट मीडिया के माध्यम से 75 फीसदी जनता की आवाज को सामने नहीं लाया जा सकता। तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया महज 25 फीसदी तक सिमटे हुए हैं। ये कार्पोरेट मीडिया बड़े विज्ञापनदाता भी हैं। ऐसे में देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिए बिना समानता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों की समस्याओं का हल नहीं किया जा सकता।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि केरला की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा ने कहा कि समानता, सबको अवसर, आजीविका के बिना देश में सही मायने में लोकतंत्र नहीं है। आज पूंजीवादी एवं सामंतवादी व्यवस्था हावी है। वास्तविक आजादी के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। देश में 2 हजार से ज्यादा भाषाएं हैं, 6000 से ज्यादा जातियां हैं, सैकड़ों पंथ एवं कई धर्म हैं। इस विविधता का हमें सम्मान करना होगा। संविधान बनाते समय हमने प्रगतिशील विचारों को अपनाया और अखंडता, समता, समानता एवं समाजवाद की बात की। इन्हें आज हम बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हासिल नहीं कर सकते। सामाजिक बदलाव के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण बहुत ही जरूरी है। उन्होंने अपने उद्बोधन में कोविड-19 के समय केरल सरकार द्वारा किए गए प्रबंधन के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि केरल में बेड या ऑक्सीजन के अभाव में किसी व्यक्ति की मौत नहीं हुई। केरल ने कोविड-19 महामारी का सामना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ किया।

इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिक्स साइंसेस, चेन्नई की प्रो. डी. इंदुमती ने कहा कि उच्च शिक्षा में दशमलव 6 फीसदी बजट खर्च हो रहा है, जिसकी वजह से विज्ञान में शोध के अवसर कम हुए हैं। उन्होंने इस बात पर चिंता जाहिर की कि शोध संस्थानों में भी जिस तरह से लिखित परीक्षा के माध्यम से केन्द्रीकृत तरीके नामांकन दिया जा रहा है, उससे बहुत सारी प्रतिभाओं को मौका नहीं मिल पा रहा है। हम तकनीक को अपनाते जा रहे हैं, लेकिन मूल विज्ञान पर न तो शोध कर रहे हैं और न ही उसकी चर्चा। आज इस बात की जरूरत है कि नए शोध संस्थान खोले जाएं और उनके लिए ज्यादा फंड दिए जाएं।

वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने अपनी एक कविता ‘‘यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’’ सुनाते हुए वर्तमान राजनीतिक और वैज्ञानिक चुनौतियों पर टिप्पणी की। उन्होंने सुनाया – ….. व्यक्ति के लिए नहीं, पूरे देश के लिए हानिकारक है/दिनोंदिन बढ़ते जाना अमेरिका का दबाव, राष्ट्रवाद का नया उफान/वित्त पूंजी का प्रपंच, बजरंगियों का उत्पात, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का/लगातार फैलता जाल/एक प्रधानमंत्री का इतनी बुरी कविता लिखना/हानिकारक है………./हानिकारक है संविधान की समीक्षा, इतिहास परिषद पर मंडराता खतरा/और सबसे हानिकारक है उनका राष्ट्रवाद…….।

कार्यक्रम की प्रस्तावना पर बोलते हुए ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क के अध्यक्ष डॉ. सब्यसाची चटर्जी ने कहा कि मेघनाथ साहा, रबिन्द्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे हमारे देश के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक, साहित्यकारों एवं राजनेताओं ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात की है, जिन्होंने भारत की विविधता और बहुलता में एकता को महत्व दिया है। आज इसे नकारने का प्रयास किया जा रहा है।

स्वागत उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार रामप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि आज हम अवैज्ञानिक एवं चुनौतीपूर्ण समय में जी रहे हैं। विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिक बातें की जा रही हैं, जबकि भारतीय संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है। मौजूदा समय में जन विज्ञान आंदोलन की ज्यादा जरूरत है। उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुए राहुल शर्मा ने कहा कि आज के समय में विज्ञान एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना सामाजिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।

कार्यक्रम में पुस्तकों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर बिहार एवं मध्यप्रदेश के साथ-साथ उत्तर-पूर्व के राज्यों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी। विभिन्न राज्यों के पुस्तकें एवं उत्पादों के स्टॉल लगाए गए हैं। आंध्रप्रदेश के प्रतिभागियों ने अंधविश्वास एवं भ्रांतियों की वैज्ञानिक व्याख्या के लिए लाइव डेमो का स्टॉल लगाया है। जन विज्ञान कांग्रेस में अगले दो दिनों तक शिक्षा एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति, आजादी के 75वें साल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर विचार, स्वास्थ्य, निजीकरण एवं विकास सहित पैनल विमर्श के साथ-साथ उप विषयों पर दर्जनों कार्यशालाएं आयोजित होंगी।

आयोजन में प्रो. अनिता रामपाल, प्रो. सुरोजीत मजूमदार, पूर्वा भारद्वाज, प्रो. आर. रामानुजन, प्रो. विनीता गोवडा, प्रो. डी. इंदुमती, मयंक वाहिया, गौहर रजा, किशोर चंद्र, विवेक मोंटेरियो, प्रो. सत्यजीत रथ, समीर गर्ग, इंदिरा चक्रवर्ती, वंदना प्रसाद, टी. सुंदररमन, दिनेष अब्रोल, अशोक धावले, डी. रघुनंदन, रामालिंगम ई., थॉमस फ्रैंको सहित कई वरिष्ठ वैज्ञानिक, शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इस दौरान “भारत का विचार : वैज्ञानिक स्वभाव, आत्मनिर्भरता और विकास“ विषय पर वरिष्ठ चित्रकार मनोज कुलकर्णी की पेंटिंग प्रदर्शनी लगाई गई है। जन विज्ञान कांग्रेस का समापन 9 जून को किया जाएगा।